दिन-रात

दिन
मेरे जीवन को
उजाले से
भर देता
मैं उसको
दूर से ही
जी
भरके देखा करता
सपने बुनता
गाने गाता
हंसता
मुस्कुराता
पर
रात
मेरे जीवन में भी
अंधेरा
ला देती
और
मैं उनको
देखने के लिए
सुबह
की प्रतिक्षा में
रात भर
करवटें
बदलता रहता

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

बिहार से छीनो, बंगाल को दो...

किछ हरायल शब्द

हमर विआह-10

पूर्णिया मे सुखोई

हमर विआह -1 (पहिल कड़ी)

सौभाग्य मिथिला : मैथिलीक अपन चैनल

हमर विआह 4 (चारिम कड़ी)

राग-विराग

हमर विआह- 8

कि इहे सभागाछी अछि ?