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विद्यापतिक आँखि मे नोर

देखि हमरा चिंता भेल घोर,
विद्यापतिक आँखि मे नोर।

नहि देखल ई स्वप्न मे ,
देखलहुं गिरीश पार्कक एक कात मे ,
हुनक श्वेत प्रतिमा जेना हो ,
पार्कक अन्य लता, पुष्प ओ
तरु सभ सं एकदम बारल,
कोनो व्यथा सं झमारल,
समय छल शीतकालक भोर।

पहिने विश्वास नहि भेल नजरि पर ,
देखलहुं निहारि क' प्रतिमा पर ,
हुनक नेत्र सं खसयबला छल नोर एक ठोप ,
कोढ धरकय लागल छल जेना चलल हो तोप,
भेल छल ई हुनक नोर नहि , भ' सकैछ शीतक बूंद,
तखने टप सं खसल महि पर नोरक एक बूंद,
विश्वास भेल, देखलियनि हुनक कांपति ठोर।

हम कहलियनि-की मामिला छैक ?
अहांक नेत्र सजल , किएक ?
की , अहांक यशोगान मे कतहु कोताही ?
ढेर उपलब्धि सभ अछि, आब कत्ते चाही ?
कहू , मिथिला- मैथिलीक स्वर अछि दबल ?
वा एकर विरोधी तत्व भेल अछि सबल ?
थिर होऊ, नहि छोड़ब कोनो कसरि कोर।

मिथिला- मैथिलीक स्वर अछि प्रबल,
की कहै छियह सुनह कलबल ,
आम मैथिल जाबे बुझत नहि मैथिलीक मोल,
ताबे की हेतह पीटने ढोल ?
ई भेलह जे जरि ठूंठ आ फुनगी हरियर ,
मुरही कम आ घुघनी झलगर,
खाली हमर गुण गएने किछु हेतह थोड़ ?

एतबे कहि ओ पुनः भए गेलाह पाथरक प्रतिमा ,
धोआ गेल छल हमर मोनक कालिमा ,
सूर्यक तीक्ष्ण रौद लागल, लेलहुं आंखि मुनि ,
किरण फाडि देने छल शीतक प्रभावे लागल धुनि,
पेट मे कुदकय लागल छल नमहर बिलाइ ,
इच्छा भेल होटल मे किछु डटि कए खाइ ,
गेलहुं खाय , दए दाम माछ-भातक संग फ्री झोर।

आ कि शीघ्र अंतर्मन देलक एक प्रश्न पर जोर ,
 कोना सुखायत विद्यापतिक आंखि केर नोर ?
:-रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'-:
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हमर ईमेल:-hellomithilaa@gmail.com




Comments

  1. सुंदर भाव। उत्तम प्रस्तुति।

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  2. Bahut satik bhel aachi. Ek dam sa sutal lok ke jhak jhori ka rakhi deliek aachhi. Bahut Bahut Dhanyavad.
    ...............................
    ................
    ..................
    Maan Gad Gad Bha Gel.

    ReplyDelete
  3. A very good poetry. just go forward. Kavya-paksh aur bhav-paksh dunu sarahniya ay.

    ReplyDelete

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