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स्वर्गारोहण अर्थात लोकतंत्रीय मुक्ति

तीन दिन पूर्व अपन निकटतम मित्र घनश्याम बाबू केर दुर्घटना मे मृत्यु भेलाक पश्चात आय गजानन बाबू चौपाल मे बैसल उदास रहथि। योग्य रहलाक बादो एक प्राइवेट स्कूल मे कम वेतन पर नौकरी करब घनश्याम बाबूक विवशता छल कियैक तऽ घर मे वृद्ध माता, पत्नी, विवाहक योग्य पुत्रीक अतिरिक्त शिक्षारत पुत्रक भरण पोषणक भार हुनके कमाय पर। आय पूरा परिवारे बेसहारा भऽ गेल। एहेन घटना तऽ ककरो वास्ते दुखद होइते छैक लेकिन गजानन बाबूक दुख ताहि सँ बेसी बुझना जाइत अछि। जखन चौपालक लोक सब आग्रह करैत खोदि खोदि पुछलखिन्ह, तकर बाद पता चलल हुनक दुखक असली कारण।
दुर्घटनाक बाद घायल घनश्याम बाबू केँ अस्पताल आनल गेल आ डाक्टर देखतहिं मृत घोषित कऽ देलक। पुत्रक बाहर रहबाक कारणें अंतिम संस्कार तत्काल सम्भव नहि छल। गजानन बाबू आर लोक सब सँ विचार कय लाश केँ शीत गृह मे रखबाक प्रबंध करय लगलाह। लेकिन सरकारी अस्पताल - सीधा सीधी बिना घूसक एको डेग चलब मुश्किल। शीत-गृहक कर्मचारी बाजल - "जगह नहीं है"। गजानन बाबू स्थिति सँ उत्पन्न सम्वेदना देखबैत, अपन सब ज्ञान, अनुभव लगाकऽ थाकि गेलाह किन्तु शीत-गृह कर्मी अपन राग बजबैत रहल जे - "जगह नहीं है"। गजानन बाबू परेशन छलाह। ताबत सरकारी तंत्रक मौन संकेत बुझनिहार एक नवयुवक आबि कर्मचारीक हाथ मे एकटा नमरी थमाबैत कहलखिन्ह - "अब तो जगह है न"? तत्काले जगह भेट गेल। लाश राखल गेल। काज भेलाक पश्चातो गजानन बाबू दुखी छलाह।
अगिला दिन पुत्रक आगमनक बाद पोस्टमार्टमक तैयारी होमय लागल। अस्पताल मे एम्बुलेन्सक सुविधा सेहो छल। जहिना आजुक समय मे सरकारी गाड़ी सँ सरकारक काज छोड़ि शेष सब काज होइत अछि तहिना अस्पताल केर प्रबंधकक घर मे प्रबंध करवाक हेतु एम्बुलेन्सक सार्थक उपयोग भऽ रहल छल। प्रबंधकक नाम पर अपन घरक प्रबंध करवा मे ड्रावर साहेब सेहो संकोच नहि करथि। एम्बुलेन्सक कारणे देरी होमय लाग। एम्बुलेन्स आयल आओर ड्राइवर साहेब आबतहिं बजलाह - " अभी हम तुरत आये हैं, एक घण्टे के बाद दूसरे शिफ्ट का आदमी जायगा"। एतबा सुनतहि फेर शीत-गृह मे काज आयल वो योग्य आधुनिक युवक अपन चमत्कार देखौलन्हि। पचास टाकाक एकटा नोट ड्राइवर साहेब कें दैत बजलाह -"अब चलिए"। ड्राइवर तत्काल तैयार भऽ गेल।
गजानन बाबू मित्रक विछोह, मित्रक परिवारक भबिष्यक चिन्ता सँ तऽ चिन्तिते छलाह, ऊपर सँ ई सब देख भीतरे भीतर छटपटावैत रहलाह जे नैतिकता, ईमानदारी कतऽ चलि गेल। पोस्टमार्टम हाऊस मे सेहो भीड़ छल। बेसी आत्महत्या आओर बेसी दुर्घटना हमरा लोकतंत्रक बिशिष्ट बिशेषता अछि। किनारा जाऽ कऽ जखन सरकारी करमचारी सँ जानकारी लेबाक कोशिश भेल तऽ वो असंवेदनशील प्राणी बाजल - "ये भीड़ तो आप देख ही रहे हैं। सब इसी काम के लिए आया है। कोई राशन या वोट की लाइन तो है नहीं। और मेरे दो ही हाथ हैं। आपका नम्बर जब आयगा तब देखेंगे"। लोक सब अनुमान करय लगलाह तऽ चारि घण्टासँ कम केर मामला नहि छल। ताबत धरि तऽ राति भ् जायत। सबकेँ चिन्तित देख पुनः वो योग्य युवकक योग्यताक काज उपस्थित भेल। येन-केन-प्रकारेण पाँच टा नमरी पर बात फरियायल आओर मरलाक बादो लाइन तोड़ि कऽ घनश्याम बाबूक लाश केँ पोस्टमार्टम हाऊस सँ मुक्त कराओल गेल। गजानन बाबूक नैतिक शिक्षा, ज्ञान, अनुभव सबटा राखले रहि गेल। ककरा चिन्ता अछि जे मृतकक परिवार पर कतेक संकट आयल अछि। अपन वेतनक अतिरिक्त बेसी सँ बेसी आमदनी करब सरकारी सेवकक युगधर्म अछि। एहि युगधर्मक पालन सरकारी सेवकगण अबाध गति सँ सम्पूर्ण देश मे कऽ रहल छथि। एहि क्रम मे पुलिस केँ सेहो यथायोग्य दक्षिणा देबय पड़ल।
थाकल हारल मृतकक स्वजन परिजन समेत गजानन बाबू श्मशान घाट एलाह। सब जगह सँ बेसी भयावह दृश्य छल। ओहनहियो श्मशान तऽ भयावह होइते छैक। किन्तु जे भयावहता लोक सब कें देखऽ पड़लन्हि वो आओर भयावह छल। जगहक वास्तें, लकड़ीक वास्तें, अस्थि कलश रखबाक हेतु एतय तक कि मृतकक मृत्यु प्रमाण पत्रक वास्तें सेहो, सब जगह नियुक्त कर्मचारीक नियमित काजक बदला मे अनियमित रूप सँ
यथायोग्य टाका खर्च करय पड़लन्हि। एवम प्रकारें घनश्याम बाबू वर्तमान लोकतंत्रीय पद्धतिक जाल सँ मुक्त भऽ स्वर्गारोहण केलाह। गजानन बाबू सोचि सोचि भावुक एवं चिन्तित छलाह संगहि एक यक्ष प्रश्न सेहो ठाढ़ छल जे घनश्याम बाबू तऽ कहुना लोकतंत्रीय मुक्ति पाबि स्वर्गारोहण केलाह किन्तु हमर मुक्ति केर कोन रास्ता निकलत? हमर स्वर्गारोहण भऽ सकत की नहि?

-श्यामल सुमन, जमशेदपुर

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Comments

  1. अहां सभ के धन्यवाद

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  2. हां, अब ठीक है। आपके ब्लॉग मे कमेंट देने मे परेशानी हो रही थी।

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  3. हां. अब ठीक है। आपको ब्लॉग मे कमेंट देने मे परेशानी हो रही थी.

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