यादों का दर्पण

मुझसे तुम क्या दूर गई
यादों का दर्पण छोड़ गई...

दिल बहलता जिससे मेरा
साथ जो मुझको मिलता तेरा
पर तुम तो मुझसे रुठकर
ऐसे क्यूं नाता तोड़ गई...

मुझसे...

इसमें जब तेरा चेहरा दिखता
तब मैं खोया-खोया रहता
पर तुम तो सदा के लिए मेरा
तन्हाई से रिश्ता जोड़ गई...

मुझसे...

क्या-क्या नहीं सपने सजाये?
फूलों के शहर में महल बनाये
पर दिल ही नहीं तुम तो
मेरा ताजमहल भी तोड़ गई...

मुझसे...

सबने ही ठुकराया मुझको
तुमतो कहती अपना मुझको
औरों की क्या !
तुम भी तो मुंह मोड़ गई..

मुझसे तुम क्या दूर गई
यादों का दर्पण छोड़ गई...

-हितेंद्र कुमार गुप्ता

Comments

Popular posts from this blog

पूर्णिया मे सुखोई

हमर विआह- 8

कि इहे सभागाछी अछि ?

बिहार से छीनो, बंगाल को दो...

हमर विआह 4 (चारिम कड़ी)

बिहार के एकटा आओर सम्मान

दिल्ली मे सामा चकेवा

किछ हरायल शब्द

एहिना मिलत मिथिला राज्य?

मजिस्ट्रेट के पिटाई