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अथ श्री-श्री 108 स्वामी अनचिन्हारानन्द विरचित कलन्किया कथा

ई व्यंग पूर्णतः काल्पनिक अछि। एकर पात्र, घटना वा परिस्थितिसँ कोनो लेना-देना नै अछि। जँ कोनो पात्र वा घटना किनकोसँ मिलैत छन्हि तँ एकरा मात्र संयोग बूझल जाए। एहि अपीलकेँ बाबजूदो जँ केओ एहि व्यंगक घटनाकेँ
अपनासँ जोड़ैत छथि तँ ओ महाशय " स्वामी चूतियानंद" क उपाधि पेबाक जोगर छथि।........
अथ श्री-श्री 108 स्वामी अनचिन्हारानन्द विरचित कलन्किया कथा
प्रथमोध्याय प्रारम्भ:------
ओकर धूर्ताक खिस्सा सगरो पसरल छल। प्रवाद तँ एहन छलै जे कलंकिया नामक जंतु अपनो सर-समांगकेँ नै छोड़ै छै। मुदा ई बात सत्य छै जे खराप काज बेसी दिन नै चलै छै। आ ताहूमे कलंकियाक पापक घैल भरि गेल छलै। कलंकिया जखन बुढ़ारी दिस जा रहल छल तखने एकटा महिला संग भेल अनाचारक भंडाफोर भए गेलै। सगरो सनकपुरमे हाहाकार मचि गेलै। आ अंतमे सभ मीलि कलंकियाकेँ निर्वासन दंड सुना देलकै। किछु सुयोग्य व्यक्ति द्वारा कलंकियाकेँ मूँहमे हरदि-चून-कारी लगा नग्रक दक्षिण दिशामे भगा देल गेलै।भागैत-भागैत कलंकिया दक्षिण-पश्चिम दिशाक सिल्ली नामक जगहकेँ अपन कुकर्मक अड्डा बनौलक।
प्रथमोध्याय समाप्तम।
अथ श्री-श्री 108 स्वामी अनचिन्हारानन्द विरचित कलन्किया कथा द्वितीयध्याय प्रारम्भ:
ऐ दुनियाँमे बहुत तरहँक लोक होइत छै। कलंकिया सिल्ली तँ आबि गेल। मुदा ओकर मोन लगिते नै छलै।मुदा एकटा कहबी छै जे ब्रम्हाण्ड असीम छै सभ प्रश्न आ ओकर उत्तर एहीठाम प्राप्त भए जाइत छै। तखन कलंकियाकेँ संगी-संघाती कोना नै भेटौक। आ एहने समयमे कलंकियाकेँ अन्हार झासँ भेँट भेलै। अन्हार झाक पछिला रिकार्ड तँ अन्हारेमे छै मुदा वर्तमान इजोतमे कारण कलंकिया एहन सुयोग्य गुरूक प्रशिक्षणमे अन्हार झा कुकर्मक सभ सफलता अपना नाम कए लेलक। आ अन्हार झा आब अपने गुरु जकाँ महिला सभकेँ बहला-फुसला यथा योग्य काज करैत अछि। आ एहि काज सभमे अन्हारक संगी छै बुड़िलेश झा। किछु दिनक बाद कुकर्म करबामे ई सभ तेहन "प्रवीण" भए गेल जे हिनक नाम सगरो 'रोशन" भए गेल। आ हिनकर काजमे बड़का-बड़का गुरूघंटाल जेना की " दानव-चंकर-पुरान' आ " घृणित फसाद" सभ सेहो सहयोग देबए लागल।
द्वितीयध्याय समाप्तम।
अथ श्री-श्री 108 स्वामी अनचिन्हारानन्द विरचित कलन्किया कथा तृतीयध्याय प्रारम्भ:
अन्हार झा अपन कुकर्मसँ जगत-विदित भए गेल। हरेक दिन किछु ने किछु उक्ठ्ठी बला काज करिते छल। आ एहन काज करबामे ओकरा " आनंद" अबै छलै। जाहि दिन किछु नै कए पाबैत छल ताहि दिन ओ अपन घरेमे कए लैत छल। अपन घरक जनानी धरिकेँ नै बखसैत छल। मारि-पीटसँ लए कए गारि धरि ओ अपन घरक जनानी सभकेँ दैत छल। नाना प्रकारक "ललित"गर गारि ओकरा मूँहसँ "रिषी" महर्षि जकाँ निकलैत छल। धीरे-धीरे अन्हार झा नारी-उत्पीरणमे " प्रवीण" भए गेल। आ सेहो एहन प्रवीण जे ओकर संगी सभ ओहने होबए चाहै छल। ओहि कलाकेँ अपन घरमे प्रयोग कए रीवीजन करए लागल। एक दिन जखन अन्हार झाकेँ बाहरमे दंद-फंद नै सुतरलै तखन ओ अपन घरमे जा जनानी सभकेँ मारि-गारि देबए लागल। आ ताहि समयमे हुनक किछु संगी सेहो ई सभ देखि रहल छल। ई सभ खत्म होइते अन्हारक संगी सभ अन्हारक प्रशंसा करए लागल जे की संक्षिप्त रुपे एहि ठाम देल जा रहल अछि-----
१) टाष्कर झा--------वाह अन्हार जी वाह।बहुत नीक। टेक्नीकसँ भरपूर छल अपनेक ई एक्ट। हस्त-चालनक संग अहाँक मूँहसँ जे गारि निकलैए से अद्भुत। आजुक जमानामे एहने मल्टी-टेलेन्टेड लोककेँ जरूरति छै। हमहूँ अहाँसँ सीखए चाहैत छी आ सीखि अपन घरमे प्रयोग करए चाहैत छी। हमरा अहाँक आशीर्वाद चाही।
२) बुड़िलेश झा------वाह गुरू जी। आब हमहूँ एहने करब।
3) सौतन तृष्णा----- वाह की बात छै। काश हमहूव एना कए पबितहुँ।
4) छिनार मगन----- वाह। एहनाहिते एक बेर फेर अपन जनानी सभ पर लात-पत्रकेँ प्रयोग करू।what a unique style of slang word...
5) लाष्कर लष्ट------वाह अन्हार जी वाह। उत्तम।
अथ श्री-श्री 108 स्वामी अनचिन्हारानन्द विरचित कलन्किया कथा समाप्तम।

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