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न्यू मीडिया केर संग चलु

दिल्ली मे पिछला दिन भारतीय नीति प्रतिष्ठान... Indian Policy Foundation के तरफ सं न्यू मीडिया: चुनौती और संभावनाएं विषय पर परिचर्चा भेल. एहि मे दिल्ली के कइटा मीडियाकर्मी शामिल भेलाह. सभ अपन-अपन विचार राखलखिन्ह.

एहि पर एकटा पुस्तिका सेहो निकालय गेल अछि. जेहि मे पत्रकार सभ के विचार के जगह देल गेल अछि. हमर विचार के सेहो किछ जगह मिलल अछि. ई मीडिया खबर मे सेहो
आएल अछि. हम मीडिया खबर मे आएल ओहि अपन विचार के एहि ठाम अहां सभ के लेल राखि रहल छी.

ओना ई हिन्दी मे अछि मुदा गाम-घर के लोक के एहि के बारे मे किछ जानय के मौका मिलतन्हि.

इंटरनेट की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए गूगल पर निर्भर रहने वाले लोगों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि इसके साम्राज्य को भी कोई चुनौती दे सकता है. पर आज ऐसा हो रहा है. एक सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक ने गूगल के साम्राज्य को हिला कर रख दिया है. लेकिन ये संभव क्यों हो रहा है? ये सब हो रहा है सामाजिक ताने-बाने के बिखरने की वजह से. पहले जब शहरीकरण नहीं हुआ था लोग गांव मे रहते थे. एक-दूसरे को अच्छी तरह से जानते-समझते थे. पर्व-त्योहार...नाच-गाना... भोज-भात... सुख-दुख में साथ होते थे. एक-दूसरे का सहारा बनते थे.

आज किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है. सब बनावटी है. सब कुछ बस हाय-हैलो तक सीमित है. लोगों को गांव-घर के जैसे किसी सहारे की तलाश है. ऐसे में लोगों को साथ मिल रहा है न्यू-मीडिया का. न्यू मीडिया से जुड़ाव किसी भी रूप में हो सकता है ब्लॉग... वेबसाइट... सोशल नेटवर्किंग... चैट... सर्च या फिर एडल्ट साइटों के वेब सर्फिंग के रूप में...या वो सब कुछ जो नेट और कंप्यूटर से जुड़ा है.

नेट... कंप्यूटर आज लोगों की खास जरूरत बन गई है. ज्यादा से ज्यादा लोग इससे जुड़ रहे हैं. किसी भी तरह की खबर के लिए डाक... अखबार... रेडियो... टीवी न्यूज़ का इंतजार नहीं करते. बस एक माउस क्लिक और आप जुड़ जाते हैं देश-दुनिया से... अपने-पराए सभी तरह के लोगों से. हर वक्त अपडेट हो रही खबरों से रूबरू होते रहते हैं. नई खबरें ही नहीं पुरानी खबरें भी आसानी से सर्च कर सकते हैं... जो और माध्यम के संग आसान नहीं है.

एक खूबी और भी है कि जहां रेडियो... टीवी और अखबार के लिए काफी लोगों की जरूरत होती है. इस मीडिया को दो-चार लोग भी आसानी से चला सकते हैं और कमाई कर सकते हैं. हमेशा अपडेट कर सकते हैं. लोगों से जुड़े रह सकते हैं. इसमें लाइब्रेरी बनाने और ऑकॉइव करने की भी जरूरत नहीं होती. गूगल देवता एक इशारे पर सभी कुछ हाजिर कर देते हैं. जरा सा इशारा हुआ नहीं कि सामने ढेर सारा नजारा मौजूद होता है.

न्यू-मीडिया... वेब साइट... ब्लॉग से अब लोकल खबरें ज्यादा पढ़ने को मिल जाती है. जबकि प्रिंट में स्थानीय एडीशन होने से दरभंगा... मुजफ्फरपुर... पूर्णिया... आगरा... रायपुर जैसे शहरों की खबरें राष्ट्रीय एडीशन और दूसरे जगहों पर पढ़ने के लिए नहीं मिलती. मगर वेबसाइट के साथ ऐसा नहीं है. दिल्ली में रहते हुए भी आप अपने गांव-शहर की खबरें वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं. लैपटॉप... नेटबुक... स्मार्टफोन से ये जुड़ाव और भी आसान और मजबूत हो गया है.

न्यू मीडिया के कारण सिर्फ वेबसाइट... ब्लॉग ही नहीं प्रिंट... रेडियो और टीवी की पत्रकारिता भी बदल गई है. रिपोर्टर अब मोबाइल... स्मार्ट फोन... ब्लैकबेरी से ही ब्रेकिंग न्यूज...फुटेज भेजने लगे हैं. 3-जी के बाद तो अब फोन पर लाइव भी देने लगेंगे. देश मे 4-जी आने पर इसमें और क्रांतिकारी बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं. इसने लोगों की दुनिया बदल कर रख दी हैं... लोगों के रहने-खाने-पीने और सोचने के तरीके को बदल कर रख दिया है. लोग हाई-टेक होते जा रहे हैं. तकनीकी से जुड़ते जा रहे हैं.

न्यू-मीडिया को अभी काफी सफर तय करना है. इसके सामने अभी ढेर सारी चुनौतियां हैं. इसके राह में सबसे बड़ी बाधा है इसका आम लोगों से जुड़ा न होना. आसानी से पहुंच में होने के बावजूद ये आम लोगों के पहुंच में नहीं है. देश की एक बड़ी आबादी नेट कनेक्शन... नेट सुविधा से दूर है. अब भी देश में नेटवर्क काफी छोटा है. हजारों गांव नेट से नहीं जुड़े हैं.

देश के करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके पास कंप्यूटर... लैपटॉप... नेटबुक या स्मार्टफोन नहीं है. खरीदना महंगा है...चलाना महंगा है...हर महीने नेट चार्ज देना पड़ता है जो अखबार... रेडियो और टीवी की तुलना में ज्यादा है. अगर घर में नेट कनेक्शन है भी तो बिजली नही है... बिजली है तो स्पीड नहीं है. बार-बार साइबर कैफे भी नहीं जाया जा सकता और फिर ये माध्यम पढ़े लिखे लोगों के लिए है. देश के करोड़ों लोग जो पढ़े-लिखे नहीं है... रेडियो-टीवी की तरह इसका फायदा नहीं उठा सकते.

हजारों गांव के लोग पैसा... पावर... रसूख होते हुए भी इससे जुड़े नहीं नहीं हैं क्योंकि अभी तक उनके पास इसकी पहुंच नहीं है. फिर इससे ज्यादातर नई पीढ़ी के लोग... युवा लोग जुड़े हुए हैं...जो ऑर्कुट... फेसबुक... मायस्पेश... लिंक्डइन जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट से जुड़े होते हैं. इसके अलावा नेट पर जुड़ने वाले लोग मेल चेक करने... सर्च करने या फिर एडल्ट साइट पर तफरी मारते हैं. बहुत कम लोग न्यूज़ साइट और ब्लॉग की ओर रुख करते हैं.

विदेशी वेबसाइट की तुलना में भारतीय वेबसाइट अपडेट नहीं रहते. अपडेट कम करते हैं. न्यूज़ साइट वाले सभी में एक ही तरह की खबरें मिलती हैं पीटीआई... यूएनआई... आईएएनएस की. प्रिंट से पहले कोई खास एक्सक्लूसिव स्टोरी नेट पर नहीं डालते. इक्का-दुक्का साइट हैं जिसे स्पेशल स्टोरी करने के लिए जाना जाता है.

भारतीय साइट इस मामले में अपनी कोई पहचान नहीं बना पाई है. स्थापित नहीं हो पाई है. अपनी अलग से कोई खास भरोसा और विश्वसनीयता नहीं बना पाई है. साइट मॉडरेटर... वेब रिपोर्टर... ब्लॉग चलाने वालों को इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी. अपनी मौलिकता कायम रखनी होगी.. अपनी विशेषता बनाए रखनी होगी. एकतरफा खबर देने से बचना होगा. अफवाह से बचना होगा.

पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांत डब्ल्यू-एच को ध्यान में रखकर चलना होगा. न कि भेड़चाल का हिस्सा बनकर. जब तक खुद संतुष्ट न हो खबर को पोस्ट करने से बचना होगा. जबकि आजकल हो रहा है एकदम से उलट. आजकल जो जितना चिल्ला रहा है मार्केट में वो उतना छा रहा है. कुछ लोग तो इसे ब्लैकमेलिंग का हथियार भी बना रहे हैं. कुछ साइट जो लोकप्रिय हो रहे हैं वो पंजाब केसरी की राह पर जाने के कारण.

वेब...ब्लॉग पत्रकारों को जो मान्यता मिलनी चाहिए वो नहीं मिल पा रही है. इसके पत्रकार भी सिर्फ ब्लॉग...साइट के लिए एक्सक्लूसिव स्टोरी नहीं कर पा रहे हैं. न्यू साइट वाले भी खबर की जगह गूगल ट्रेंड के हिसाब से चलते हैं. जिससे सभी खबरों को जगह नहीं मिल पाती. सिर्फ चुनिंदा सर्च लायक... हॉट कीवर्ड वाली न्यूज़... स्टोरी ही लेते हैं.

नेट पर कई बार खबर मर भी जाती है... पॉलिसी मेकर्स पर जो असर पड़ना चाहिए वो नहीं पड़ता. फिर जिसके लिए हम लिखते हैं कई बार उन लोगों तक इसकी पहुंच नहीं होती. अखबार की खबरों की तरह उसकी प्रतियां लहरायी नहीं जा सकतीं. अखबार...टीवी की तरह इससे कमा भी नहीं सकते. अंग्रेजी साइट तो कुछ कमा भी रहे हैं हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाई साइट तो एकदम ही नहीं.

विदेशों की तरह भारत में खास विषयों पर साइटों की कमी हैं. भारतीय भाषाओं मे ऑटो... गजेट... फैशन... क्राइम... लिविंग-रिलेशनशिप... पेरेंटिंग... आर्ट ऑफ लिविंग... एडल्ट एजुकेशन... कृषि... टूर-ट्रैवल... निवेश... रिसर्च.. गहरी... विश्लेषणात्मक जानकारी वाली साइटें नहीं के बराबर हैं. हिन्दी के साइटों में फॉन्ट की भी परेशानी है. सभी को यूनिकोड के साथ चलना होगा.

अगर इन चंद परेशानियों पर ध्यान न दिया जाए तो आना वाला समय न्यू मीडिया का है... कंप्यूटर से जुड़े लोगों का है. बस आप समय के साथ...तकनीकी के संग चलत रहिए. कुछ खास बातों का ध्यान रखिए. ट्रेड के हिसाब से चलिए. कीवर्ड... कंटेंट में नयापन पर ध्यान दीजिए. कुछ न कुछ रोज़ लिखिए. सोशल नेटवर्किंग साइट से जुड़कर प्रचार-प्रसार कीजिए.

जिस तरह से हो अपने ब्लॉग...साइट के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को बताइए. अपने साथ जोड़िए. अगर न्यूज़ साइट नहीं है तो सभी विषयों पर न लिख कर किसी खास विषय पर लिखिए. अपनी एक अलग पहचान बनाइए. ऐसा लिखिए जिसे पढ़ने के लिए लोग आपकी साइट पर आने को विवश हो जाएं. उनकी पसंद-नापसंद का ध्यान रखिए.

साइट के स्टेट्स... रैंकिंग... एनॉलेटिक्स पर नजर रखिए. लोग क्या चाहते हैं और आप क्या दे सकते हैं इस पर विचार करिए. संभव हो सके तो मार्केटिंग से जुड़े लोगों को रखिए. विज्ञापन देने वाले लोगों से सम्पर्क बढ़ाइए. गूगल एडसेंस के साथ दूसरे प्रमुख एफलिएट कंपनियों का विज्ञापन लगाइए. भारत में कई ऐसी कंपनियां हैं जो हिंदी साइटों को भी अच्छा विज्ञापन देती हैं.

लेकिन इसके लिए हिट बढ़िया हो. बढ़िया हिट के लिए एसईओ पर विशेष ध्यान रखिए. हो सके तो इससे जुड़े लोगों की सेवा... मदद लीजिए. जम के लिखिए...जम के कमाइए. अगर कोई दिक्कत हो तो हम लोग मिल बैठ कर कमाई का रास्ता निकाल सकते हैं. एक दूसरे के सम्पर्क में बने रहिए.

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हमर ईमेल:-hellomithilaa@gmail.com

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